भक्ति आंदोलन क्या है और भक्ति आंदोलन कब हुआ था?

मेरे दोस्तों आज हम आपको भक्ति आंदोलन के बारे में पूरी जानकारी देंगे. इसलिए आप पोस्ट को पूरी तरह पढ़िएगा। और कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं कि आपको यह पोस्ट कैसी लगी।

भक्ति आन्दोलन क्या है?

भक्ति आंदोलन में भारतीय इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना है इस आंदोलन का आरंभ तुर्कों के आगमन के पश्चात भारतीय धर्म एवं समाज में व्याप्त संकीर्तन के उन्मूलन हेतु हुआ।

तुर्की शासकों की धार्मिक कट्टरता से हिंदू एवं मुस्लिम दोनों धर्मों में वैमनस्य की खाई पैदा हो गई थी और भारतीय समाज और अधिक अंधविश्वास एवं संगीन हो गया था।

ऐसी स्थिति में सामाजिक एवं धार्मिक क्षेत्रों में सुधार की दृष्टि से भक्ति को माध्यम बनाकर जिस आंदोलन का सूत्रपात हुआ वह भक्ति आंदोलन के नाम से जाना गया।
इस आंदोलन के उद्देश्य के विषय में डॉक्टर आशीर्वाद लाल प्रचार और प्रसार के आक्रमणों को झेल सके और द्वितीय हिंदू इस्लाम धर्म समन्वय स्थापित करना और दोनों जातियों में अच्छे संबंध स्थापित करना।

Read More: सिकन्दर और पोरस की प्रेरणादायक कहानी

भक्ति आन्दोलन के प्रमुख कारण

अब हम आपको भक्ति आंदोलन के प्रमुख कारणों के बारे में बताएंगे भक्ति आंदोलन क्यों हुआ और इसके क्या कारण थे।

1. जटिल ब्राह्मण धर्म ( complicated Hindu religion)-इस समय तक ब्राह्मण धर्म का स्वरूप अत्यंत जटिल आडंबर युक्त तथा कर्मकांडी हो चुका था जिसके कारण साधारण जनता उसका पालन नहीं कर पा रही थी इन्हीं परिस्थितियों में भक्ति के सरल मार्ग पर आधारित अनुकूल समय पाकर आरंभ किया गया।

2. मुस्लिम आक्रमणकारियों की विध्वंस नीति (Destruction policies of Muslim Invader)- मध्यकाल में मुस्लिम शासकों की धार्मिक कट्टरता एवं अनेक मुस्लिम आक्रमणकारियों की विध्वंस की नीति में अनेक हिंदू मंदिरों एवं मूर्तियों को क्षति पहुंचाई उनके धार्मिक कार्यों एवं पूजा आदि पर भी प्रतिबंध लगाया गया इन परिस्थितियों में ईश्वर भक्त हिंदूओं ने अपने इष्ट देवताओं की पूजा के लिए भक्ति का सरल मार्ग अपनाया।

3. वर्ण व्यवस्था की कठोरता (Rigidity of Varna system)- मध्य काल में विदेशी आक्रमणकारियों से भारतीय समाज की रक्षा के लिए कई हिंदू विचार को ने वर्ण व्यवस्था को पहले की अपेक्षा अधिक कठोर बना दिया।

उच्च जातियों ने निम्न जातियों के साथ खानपान विवाह आदि पर प्रतिबंध लगा दिया छुआछूत विभिन्न वर्णों में भेदभाव जैसी कुप्रथा समाज में उत्पन्न हो गए निम्न जातियों की स्थिति पहले से अधिक खराब हो गई।

उन्हें अधिकारों से वंचित कर दिया गया किंतु भक्ति आंदोलन ने ऊंच-नीच छुआछूत का भेदभाव मिटाकर भक्ति के मार्ग द्वारा मोक्ष का द्वार सभी के लिए खोल दिया।

4. राजनीतिक वातावरण (political Atmosphere)- तुर्कों के आक्रमण से हिंदू धर्म एवं समाज को गहरी क्षति पहुंची। कुतुबुद्दीन ,बलबन, अलाउद्दीन खिलजी जैसे अनेक शासकों ने भी शुद्ध रूप से हिंदू राज्यों की स्थापना की विजय नगर एवं मेवाड़ के राजपूतों ने एक बार फिर हिंदुओं को संगठित करना प्रारंभ किया ।

मुस्लिम शासकों के कमजोर पड़ते ही हिंदुओं को पुनः उत्पत्ति करने का शुभ अवसर प्राप्त हुआ। रामधारी सिंह दिनकर के अनुसार कुछ तो इस्लाम का थक्का खाने से घबराकर और कुछ सूफियों के प्रभाव में आकर हिंदुत्व जगह और जाकर अपने रूप को सुधारने लगे वह बहुत कुछ इस्लाम का प्रभाव था और इस प्रभाव के कारण रूढ़ियों में सिकुड़ा हुआ हिंदुत्व और उदार हो गया।

5. इस्लाम का प्रभाव (Impact of Islam)- कुछ विद्वानों का विचार है कि भक्ति आंदोलन का प्रारंभ इस्लाम के संपर्क के कारण हुआ इस्लाम में एक ईश्वर की कल्पना को महत्व दिया जाता है तथा जाति प्रथा का विरोध किया जाता है ।

भक्ति आंदोलन के सभी संतो ने इन दोनों सिद्धांतों का समर्थन किया यद्यपि इन विद्वानों की बातों को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया जा सका जा सकता फिर भी यह सत्य है कि इस्लाम की सरलता जाती पाती का विरोध एक ईश्वरीय वादी सिद्धांतों ने हिंदू विद्वानों का ध्यान आकर्षित किया ।

भक्ति आंदोलन की विशेषताएं (Characteristics of Bhakti Movement)

हेलो दोस्तों आज हम आपको भक्ति आंदोलन के सभी विशेषताओं से परिचित कराएंगे।

1. सदाचार एवं पवित्रता पर बल –भक्ति आंदोलन के समर्थकों ने धार्मिक कर्मकांड एवं नंबरों की निंदा करते हुए सदाचार एवं पवित्रता का उपदेश दिया।

2. एक ईश्वर की कल्पना- इस आंदोलन के संतो ने ईश्वर की एकता का संदेश दिया जिससे विभिन्न धर्मों के मध्य एकता का प्रसार हुआ।

3. गुरु की महत्ता पर बल-

4. भक्ति आंदोलन के संतों ने ईश्वर की प्राप्ति गुरु द्वारा ही संभव बताई इसलिए गुरु को अत्यधिक महत्व दिया गया गुरु ही लोगों की अज्ञानता दूर कर उन्हें भक्ति के मार्ग पर ले जाता है

5. मानवता दृष्टिकोण- इस आंदोलन के सुधार को ने लोगों को आपसी कटुता एवं वैमनस्यता को दूर कर प्रेम एवं विश्व बंधुत्व की शिक्षा प्रदान की उन्होंने कहा कि सभी मनुष्य एक ही ईश्वर की संतान है और सभी मनुष्यों में उस ईश्वर की आत्मा का अंश विद्यमान है।

6. सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार- भक्ति आंदोलन के माध्यम से समाज में व्याप्त कुरीतियों तथा जातिवादी मूर्ति पूजा पर प्रहार किया गया जाति प्रथा पर प्रहार करते हुए रामानंद जी ने कहा

जाति पाति पूछे नहीं कोई हरि को भजे जो हरि का होई

रामानंद जी

इसी प्रकार कबीर दास ने मूर्ति पूजा का खंडन इसी शब्दों में किया “पाहन पूजे हरि मिलै, तो मैं पूजूँ पहार। ताते यह चाकी भली, पीसी खाए संसार” इस प्रकार विभिन्न कुरीतियों पर प्रहार कर इन्होंने विभिन्न वर्गों के बीच प्रेम एवं भाईचारे का संदेश दिया।

7. सरल भाषा पर बल- भक्ति आंदोलन के संतो ने जो भी उपदेश दिया वह जनसाधारण की भाषा में दिया जिससे अधिक से अधिक लोग उसे समझ सके और उसे अपना सके इस प्रकार भक्ति आंदोलन ने तत्कालीन भारतीय समाज को भक्ति का मार्ग दिखाया एवं स्पष्ट किया कि उसी के माध्यम से अपने इष्ट देव को प्राप्त किया जा सकता है।

भक्ति आन्दोलन के प्रमुख संतों के नाम

हेलो दोस्तों आज आपको विशेष रूप से भक्ति आंदोलन के प्रमुख संतो के संक्षिप्त परिचय आपके सामने प्रस्तुत करेंगे। आप लोगों से आग्रह है कि ध्यान पूर्वक भक्ति आंदोलन के प्रमुख संतो के संक्षिप्त परिचय को पढ़िएगा। सबसे पहले आपको सभी संतों के नाम से परिचित कराते हैं

भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत

  1. रामानुजाचार्य ( Ramanujacharya)
  2. रामानंद(Ramanand)
  3. वल्लभाचार्य(Vallabhacharya)
  4. निंबार्काचार्य (Nimbarkacharya)
  5. माधवाचार्य (Madhvacharya)
  6. चैतन्य महाप्रभु( Chaitanya mahaprabhu)
  7. कबीर (Kabir)
  8. नामदेव ( Namdev)
  9. गुरु नानक देव (Guru Nanak Dev)
  10. मीराबाई (Mirabai)
  11. संत तुकाराम( sant Tukaram)

अब हम आपको बारी-बारी से भक्ति आंदोलन के प्रमुख संतो के संक्षिप्त परिचय देता हूं।

रामानुजाचार्य (1017-1137ई)

Ramanujacharya

भक्ति के सिद्धांत का प्रतिपादन करने वालों में रामानुजाचार्य का नाम उल्लेखनीय हैं उनका जन्म दक्षिण में 12वीं शताब्दी में हुआ था। रामानुजाचार्य ने विष्णु की भक्ति का समर्थन और साथ ही शंकराचार्य के अद्वैत मत का विरोध किया।

उनका मानना था कि आत्मा तथा परमात्मा भिन्न है। यद्यपि आत्मा का उदय परमात्मा से होता है जैसे आग से चिनगारी किन्तु वह पूर्ण निराकार वस्तु नहीं है। उसमें सौंदर्य तथा शोभा इत्यादि विशिष्ट गुण कसीम मात्रा में पाये जाते हैं।

इस प्रकार रामानुजाचार्य ने सगुण ईश्वर की उपासना की शिक्षा दी और दक्षिण भारत में बहुत-से लोग उनके अनुयायी हो गये । उनका सिद्धांत विशिष्टाद्वैत के नाम से प्रसिद्ध है इस महान भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत की मृत्यु लगभग1137ई0 में हुई।

रामानंद

रामानंद का जन्म 1299 ईस्वी में प्रयाग में एक कान्यकुब्ज परिवार में हुआ था ।उन्होंने भी लोगों को भक्ति का उपदेश दिया उनका भक्तों का सिद्धांत रामानुज के सिद्धांत से विभिन्न था।

उन्होंने राम और सीता की वनवास का उपदेश दिया और सभी जातियों के मनुष्यों को अपना शिष्य बनाया उन्होंने अपना उपदेश हिंदी भाषा में दिए इस प्रकार सर्वसाधारण में विशेष कार्य निम्न श्रेणी के लोगों में उन्होंने अत्यधिक ख्याति प्राप्त कर ली राम रामानंद के शिष्यों में कबीर बहुत प्रसिद्ध हुए। रामानंद की मृत्यु 1411ई में हो गई।

वल्लभाचार्य

वल्लभाचार्य दक्षिण तैंलग ब्राह्मण थे । उनका जन्म 1479 में हुआ था जिस प्रकार रामानंद राम भक्ति का उपदेश देते थे उसी तरह वल्लभाचार्य ने श्री कृष्ण भक्ति का उपदेश दिया।

अलौकिक प्रतिभा के अधीन होने के कारण वे कम आयु में ही विद्या संपन्न हो गई वह बाल गोपाल के रूप में कृष्ण की उपासना करते थे उन्होंने अपने भक्तों को प्रत्येक वस्तु कृष्ण की सेवा में समर्पित कर देने पर देने का आदेश दिया किंतु वल्लभाचार्य के उपरांत उनके अनुयायियों ने इस सिद्धांत का भौतिक अर्थ लगाया इस कारण इसकी उसकी पवित्रता एवं मान्यता कम हो गई वल्लभाचार्य की मृत्यु 1531 ई ० में वाराणसी‌ में हुई थी

निम्बार्काचार्य

इस महान भक्ति आंदोलन के संत का जन्म 1165ई में मद्रास के विल्लारी जिले स्थित निंबापुर नामक स्थान पर हुआ था निम्बार्काचार्य रामानुजाचार्य समकालीन थे

उन्होंने कृष्ण भक्तों पर बल देते हुए कहा कि कृष्ण भक्ति से मोक्ष प्राप्त हो सकता है उनका सिद्धांत अद्वैत तथा द्वैत दोनों में सामंजस्य स्थापित करता है।

माधवाचार्य

माधवाचार्य भक्ति आंदोलन संतो में से एक थे इनका जन्म 1199 सदी में हुआ था वह भगवान विष्णु के उपाय उपासक थे तथा उन्होंने युवावस्था में सन्यास ग्रहण कर लिया था उनका अध्ययन इतना व्यापक था कि उन्होंने शास्त्रार्थ में भी बहुत ज्ञान अर्जित कर लिया था. माधवाचार्य हरिद्वार में रहते थे

तथा वहीं पर इन्होंने वेदांत भाष्य तैयार किया था उन्होंने विष्णु की भक्ति पर जोर दिया 1228 भी में इन इस महा संत की मृत्यु हो गई।

चैतन्य महाप्रभु

यह वैष्णो धर्म के महान आचार्य चैतन्य महाप्रभु नदिया जिला पश्चिम बंगाल के निवासी थे वह 1486 इसमें में ब्राह्मण वंश में उत्पन्न हुए थे 25 वर्ष की अवस्था में उन्होंने प्रेम दया मात्र अभाव का उपदेश दिया और जाति विभेद को व्यर्थ बताया दीन दुखियों तथा असहाय के लिए उनका हृदय दया से भरा हुआ था।

चैतन्य ने चांडाल उत्तक को श्रद्धा और प्रेम की शिक्षा दी उनके धर्म में बड़े छोटे का कोई भेजना था 1533 बी में पूरी चेतन महाप्रभु की मृत्यु हो गई

कबीर

कबीर का जन्म संबंधित 1398 में हुआ था वह रामानंद के शिष्य थे कहा जाता है कि उनका जन्म एक विधवा ब्राह्मणी के गर्व से हुआ था जिसने लोक लाज के भय से उन्हें काशी के पास लहरतारा नाम तालाब के पास छोड़ दिया

वहां से नीरू नाम के एक जुलाहे दंपत्ति ने उनका पालन पोषण किया और उनका नाम कबीर रखा कबीर जन्म से ही धार्मिक प्रवृत्ति के थे कबीर के उपदेशों पर इस्लाम का प्रभाव दिखाई पड़ता है उन्होंने ईश्वर की एकता पर बल दिया और जाति भेद तथा मूर्ति पूजा की निंदा की कबीर हिंदू और तुर्क में कोई भेद नहीं करते थे।

उनका कहना था कि दोनों ही मिट्टी के पुतले हैं और विभिन्न मार्गों से एक ही लक्ष्य पर पहुंचने का प्रयत्न कर रहे हैं कबीर की मृत्यु 1510 ईस्वी में मगहर नामक स्थान न पर हुआ था

नामदेव

यह भक्ति आंदोलन के प्रमुख संतों में से एक थे वह महाराष्ट्र के रहने वाले थे डॉक्टर ताराचंद ने उनकी जन्मतिथि 1270 भी बताई है कुछ विद्वान उनका जन्म 14वीं शताब्दी में मानते हैं

उन्होंने प्रारंभ में सगुण भक्ति तथा बाद में निर्गुण एवं निराकार ब्रह्म की उपासना पर बल दिया उन्होंने खेचर नाथ नामक नाथपंथी से दीक्षा ली थी नामदेव ने स्वयं कहा था मन मेरी सुई तब मेरा धागा खेचर जी के चरण पर नामा सीपी लगा उन्होंने गुरु की महानता पर अधिक बल दिया उन्होंने कहा गुरु चाहे कुछ भी हो सकता है

गुरु नानक देव

गुरु नानक देव जी भक्ति आंदोलन संतो में से एक हैं इस काल के एक अन्य महान संत सिख धर्म के मूल प्रवर्तक गुरु नानक थे उनका जन्म 1469 इस में लाहौर जिले में रावी नदी के तट पर तलवंडी गांव में हुआ था ।

उनके माता पिता गरीब थे उनके पिता कालू अपने गांव में बनिया तथा पटवारी का कार्य किया करते थे नानक बाल्यावस्था से ही एकांत प्रिय उदासीन तथा विचार शील स्वभाव के थे पाठशाला में वे अपने सहपाठियों के साथ कोई बातचीत नहीं करते थे।

जिस समय पाठशाला के अन्य विद्यार्थी अध्ययन में व्यस्त होते थे वह एकांत में समय बिताते थे जब वह बड़े हुए तो पिता ने उन्हें वैराग्य व्रत से विमुख करने हेतु व्यापार के लिए कुछ रुपया दिया जिसे उन्होंने भूखे फाकिरों को बांट दिया।

16 वर्ष की आयु में पिता ने यह सोच कर उनका विवाह कर दिया कि संभव है वैवाहिक सुख की ओर झुक कर वह सांसारिक कार्यों में प्रवृत्त हो जाए किंतु यह प्रयास व्यर्थ सिद्ध हुआ।

उन्हें मार्ग से विचलित करने का कोई प्रतिफल ना हुआ उन्होंने देश विदेश का भ्रमण करके विभिन्नता अनुयायियों से विचार भिन्न-भिन्न में किया तथा अपनी बुद्धि और अनुभव को विकसित किया

अंत में वे संसार का परित्याग करके रावी नदी के तट पर कूटी बनाकर रहने लगे। बाद में इस भक्ति आंदोलन के प्रमुख महान संत की 1538 ई में देहान्त हो गया।

गुरु नानक ईश्वर की एकता में विश्वास रखते थे उन्होंने सभी मनुष्यों को परमात्मा की उपासना उपासना करने का उपदेश दिया उन्होंने ईश्वर मूर्ति पूजा एवं बहुत देव पूजा का विरोध किया और इस बात का समर्थन किया कि सच्चा धर्म केवल एक ही है

उन्होंने मुल्लाह पंडितों दरवेश हो और सन्यासियों से प्रभु के भी प्रभु का स्मरण करने को कहा जो कि आज मोहम्मद विष्णु तथा शिव के भी स्वामी हैं वह अत्यंत विनम्र एवं सहनशील स्वभाव के थे वह नबी और अवतारों का समान रूप से आदर करते थे वह अपने को ईश्वर का दास कहते थे।

अन्य अलौकिक शक्ति में उनका विश्वास नहीं था नानक के लिए ईश्वर का नाम तथा उनके सिद्धांत की शुद्धता और सरलता ही आ नंबरों से लड़ने के एकमात्र अस्त्र-शस्त्र थे उन्होंने सच्चरित्र पर विश्वास बल दिया और मनुष्य को सत्यवादी इस ईमानदार होने का तथा ईश्वर से डरने का उपदेश दिया।

संसार का परित्याग करना ईश्वर की दृष्टि में आवश्यक नहीं है उनकी दृष्टि में धार्मिक सन्यासी तथा भक्तों गृहस्थ समय सभी समान हैं इनमें कोई अंतर नहीं है जब तक जीवित रहे उन्होंने हिंदू मुसलमानों के मतभेदों को दूर करने की चेष्टा की उन्होंने अपने अनुयायियों पर कोई कठोर प्रतिबंध नहीं लगाए ।

गुरु नानक की मृत्यु के उपरांत राजनीतिक परिस्थितियों के कारण सिखों ने स्वयं को एक सैनिक जात के रूप में संगठित किया गुरु नानक के उद्देश्य एवं सिद्धांत सिंह शेखर की धर्म पुस्तक ग्रंथ साहब में लिखे हैं

इस ग्रंथ के द्वितीय भाग की रचना सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह ने की और अपने पहले के सिंह गुरु के सिद्धांत में उन्होंने परिवर्तन किया गुरु नानक का ईश्वर के साथ अटूट प्रेम था ईश्वर के सद्गुणों में उन्हें पूरा विश्वास था

मीरा बाई- मीराबाई राजस्थान की रहने वाली थी वह राणा रतन सिंह की पत्नी थी वह कृष्ण की उपासना में दिन रात दिन रहती थी उन्होंने स्वयं को भगवान कृष्ण को समर्पित कर दिया था तथा उनके ही भजन गाया करती थी।

संत तुकाराम

यह भक्ति काल के एक महान संत थे संत तुकाराम महाराष्ट्र के रहने वाले थे उनका जन्म पुणे के निकट देही नामक स्थान पर 1598 ईस्वी में हुआ था मात्र 13 वर्ष की आयु में ही पिता ने व्यापार का बोझ और पर डाल दिया।

पिता के मृत्यु के पश्चात उनकी आर्थिक स्थिति बिगड़ती चली गई तथा अंततः हुआ है दिलवा लिया हो गए आर्थिक संकट के कारण उनकी पत्नी की भी मृत्यु हो गई।

इन सभी कठिनाइयों से परेशान होकर तुकाराम ने अंततः भक्ति मार्ग का सहारा लिया उन्होंने निर्गुण ब्रह्म की उपासना की। उनके विश्वास अनुसार ईश्वर सर्वव्यापी है तथा सर्वशक्तिमान है उसका नाम भी है ना अनंत वह निराकार है

संत तुकाराम ने तत्कालीन समाज में व्याप्त अर्थ अंधविश्वासों कर्मकांड ओम तथा ब्रह्मा नंबरों का भी विरोध किया कबीर की भांति तुकाराम भी सामाजिक ऊंच- नीच तथा धार्मिक भेदभाव के विरोधी थे उन्होंने हिंदू मुस्लिम एकता पर बल दिया।

हम आशा करते हैं कि आपको हमारी भक्ति आंदोलन क्या है और भक्ति आंदोलन कब हुआ था? पोस्ट पसंद आई होगी. और आपको भक्ति आंदोलन के प्रमुख संतों के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त हो गयी होगी। हम आप से प्रार्थना करते हैं कि आप इस पोस्ट को लाइक और सब्सक्राइब और शेयर जरूर कीजिएगा। कमेंट में जरूर बताइए कि आपको यह पोस्ट कैसी लगी।

कोई सवाल या जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें