सिंधु घाटी सभ्यता की विशेषताएं एवं प्राचीन भारत का इतिहास

सिंधु घाटी की सभ्यता से संबंधित जानकारी के परिणाम स्वरूप भारतीय इतिहास का गौरवशाली अध्ययन अध्याय प्रारंभ होता है यह सभ्यता और संस्कृति विशुद्ध भारतीय है तथा इसका उद्देश्य रूप और प्रयोजन आदि सभी कुछ मौलिक एवं स्वदेशी है उत्खनन में प्राप्त पुरातत्व सामग्री के आधार पर सिंधु घाटी की सभ्यता की निम्नलिखित विशेषताएं उभरकर सामने आती है

सिंधु घाटी सभ्यता की प्रमुख विशेषताएं

सिंधु घाटी की सभ्यता की निम्नलिखित विशेषताएं उभरकर सामने आती है

सुव्यवस्थित नगर योजना

सिंधु घाटी की सभ्यता नगरीय सभ्यता का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करती है इसकी नगर योजना निश्चित ही विस्मय में डाल देने वाली है हड़प्पा, मोहनजोदड़ो एवं इस सभ्यता के अन्य प्रमुख पूरा स्थलों से प्राप्त अवशेषों को देखने से यह भली-भांति स्पष्ट हो जाता है कि इस सभ्यता के निर्माता नगर निर्माण की कला में अत्यंत निपुण थे।

सड़के

प्राप्त अवशेषों में नगर की सड़कें और गलियां सीधी बनी हुई है और एक दूसरे को समकोण पर काटती है नगर की प्रमुख सड़क नगर के एकदम मध्य में उत्तर से दक्षिण की ओर जाती है इसकी चौड़ाई 33 फीट है पूर्व से पश्चिम को जाने वाली एक अन्य सड़क मुख्य सड़क को समकोण पर काटती हुई जाती है इन दो प्रमुख सड़कों से समांतर और समकोण पर मिलने और काटने वाले अन्य मार्ग भी पर्याप्त चौड़े है। मुख्य मार्गों पर आकर खुलने वाली गलियां 9फीट से 18फीट तक चौड़ी है। सड़कों के दोनों ओर निर्मित मकान आकर्षक एवं भव्य है

नालियां

मकानों से गन्दे जल की निकासी की भी उत्तम व्यवस्था है पूरे नगर में नालियों का जाल बिछा हुआ है प्रत्येक सड़क और गली के दोनों ओर पक्की एवं ढकी हुई नालियां बनी हुई देखी गई। प्रत्येक छोटी नाली बड़ी नाली में और बड़ी नालियां अन्त नाले में जाकर मिलती थी इस प्रकार नगर के सारे गन्दे जल की नगर से बाहर निकासी की उत्तम व्यवस्था थी जान मार्शल के अनुसार, “ सिन्धु घाटी में नालियों की जो उत्तम व्यवस्था थी वह प्राचीन विश्व के किसी अन्य नगर में देखने को नहीं मिलती है”

नगर-शासन

नगर योजना का सुव्यस्थित एवं उन्नत रूप प्रस्तुत करने वाली इस सभ्यता में नगर की सफाई एवं स्वच्छता पर भी विशेष ध्यान दिया जाता था गलियों एवं नालियों की उत्तम व्यवस्था एवं निरन्तर स्वच्छता बनाए रखने की व्यवस्था से इस बात का संकेत मिलता है कि यहां नियमित नगर-शासन-की अवश्य रही होगी जिसके द्वारा अपना कार्य विशेष सावधानी से सम्पन्न किया जाता था।

भवन-निर्माण

सैन्धव नागरिकों का स्थापत्य कौशल उत्तम कोटि का था। इसकी पुष्टि खुदाई में प्राप्त भवनों के ध्वसावशेषों से होती है। इस काल में सामान्यतया निम्न प्रकार के भवन होते थे।

आवासीय भवन

सिंधु सभ्यता के युग में आवासीय भवन कच्चे-पक्के, छोटे-बड़े सभी प्रकार के होते थे। उत्खनन में प्राप्त भवनों के अवशेषों से तत्कालीन भवन निर्माण – कला, उनकी स्वच्छता एवं भव्यता की‌ जानकारी होती है ये भवन चौकोर होते थे बीच में एक बड़ा आंगन होता था और उसके चारों और छोटे बड़े कमरे होते थे

लगभग सभी मकानों में एक रसोई घर, एक स्नानघर एवं एक कुआं होता था समृद्ध लोगों के घरों में शौचालय भी बने होते थे कतिपय विशाल आकार के भवनों में 30 कमरे तक देखने को मिलें हैं मकानों में मिली सीढ़ियों से ज्ञात होता है कि भवन दुम जिले होते थे

घरों के दरवाजे मुख्य सड़क पर ना खुलकर पीछे की ओर गली में खुलते थे खड़िया कूटकर कच्ची अथवा पक्की ईटें बिछाकर फर्श का निर्माण किया जाता था दीवारें मोटी होती थी तथा कुछ भवनों की दीवारों पर पलस्तर के भी साक्ष्य मिले हैं मकानों की छतों के विषय में निश्चित संकेतों एवं प्रमाणों का अभाव है छतें प्राय समतल होती थी तथा उन पर सरकंडे ,घास बिछाकर मिट्टी के गारे से लेप कर दिया जाता था।

हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो में भवन निर्माण के लिए प्राय पक्की हुई ईंटों का प्रयोग किया जाता था आवासीय भवनों के निर्माण में विभिन्न प्रकार के ईंटों का उपयोग किया गया है किंतु 28 सेंटीमीटर * 14 सेंटीमीटर * 7 सेंटीमीटर आकार की ईंटों की अधिकता पाई गई है।

सार्वजनिक भवन

मोहनजोदड़ो में एक विशाल भवन के अवशेष देखने को मिले हैं यह लगभग 242 फीट लंबा और 115 फीट चौड़ा है तथा इसकी बाहा दीवार 5 फीट चौड़ी इस भवन में कई विशाल कक्ष है ऐसा प्रतीत होता है कि यह राजकीय भवन रहा होगा जिसका उपयोग जनसभा अथवा अधिवेशन के लिए किया जाता होगा।

विशाल अन्नागार

उत्खनन में एक विशाल स्नानागार प्राप्त हुआ है जिसकी लंबाई 169 फीट तथा चौड़ाई 133 फीट है विद्वानों के अनुसार यह अवश्य ही राजकीय अन्य भंडार गृह रहा होगा। हिलर के अनुसार ,यह भवन अन्नागार था।

इसमें 27 चबूतरे बनाए गए थे जिनके बीच- बीच में हवा के आवागमन हेतु खाली जगह छोड़ दी गई थी इसके ऊपर लकड़ी का कटहरा था जिस पर अनाज रखा जाता था।

विशाल स्नानागार-

मोहनजोदड़ो से प्राप्त स्नानागार विशेष रूप से उल्लेखनीय है इसकी लंबाई 54 मीटर तथा चौड़ाई 33 मीटर है इसकी बांह दीवारों की मोटाई 3 मीटर है यह विशाल स्नानागार चौकोर आंगन में बना हुआ है

जिनके जिसके चारों तरफ गैलरी एवं कमरे हैं आंगन के मध्य में मुख्य स्नान कुंड है जिसकी लंबाई 29 फिट है और चौड़ाई 30 फीट तथा गहराई 8 फीट है जिसके पास ही एक कुआं है जिसका उपयोग संभव है स्नान कुंड में जल भरने के लिए किया जाता था

स्नानागार में उतरने के लिए सीढ़ियों की समुचित व्यवस्था है स्नानागार के चारों ओर बैठकर नहाने के लिए चबूतरे बने हुए हैं जिसकी दीवारों पर विशेष प्रकार का स्तर किया गया है आर० के मुखर्जी के अनुसार “ सिंधु वासियों की सबसे प्रभावित पदक तथा प्रमुख उपलब्धि यह महान स्नानागार ही है ”सिंधु घाटी की सभ्यता” के निवासियों को उत्कृष्ट वास्तुकला का उत्तम ज्ञान था उनकी भवन निर्माण शैली एवं स्थापत्य कला प्रशंसनीय है।

हड़प्पा सभ्यता के सामाजिक जीवन

सिंधु घाटी के सभ्यता के सामाजिक जीवन के विषय में प्रमाणित रुप से कुछ भी कहा नहीं जा सकता है क्योंकि सैंधव लिपि को समाज आज तक संतोषजनक ढंग से नहीं पढ़ा जा सकता है किंतु फिर भी विभिन्न विद्वानों के अनुसंधान एवं उत्खनन में प्राप्त सामग्री के आधार पर सिद्ध नागरिकों के सामाजिक जीवन के विषय में निम्नलिखित जानकारी प्राप्त होती है

सामाजिक संगठन

सिंधु घाटी के सभ्यता में सामाजिक जीवन सरल, सादा एवं उन्नत था समाज की मूल इकाई परिवार था मोहनजोदड़ो से प्राप्त नारी की बहुसंख्यक मूर्तियों एवं मातृ देवी की उपासना से ऐसा प्रतीत होता है कि सैंधव समाज मातृसत्तात्मक रहा होगा।

समाज संभवत चार वर्गों में विभक्त था प्रथम वर्ग में विद्वान, पुरोहित ज्योतिषी वैद्य आदि आते थे द्वितीय वर्ग में योद्धा सैनिक तथा राजकीय पदाधिकारी को रखा जाता था तृतीय वर्ग में व्यापारी उद्योगपति तथा चतुर्थ वर्ग में श्रमिक नौकर चाकर आदि सम्मिलित होते थे

सिंधु सभ्यता में जाति प्रथा आदि वर्ग भेद का स्थित होने की कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं मिली है ऐसा प्रतीत होता है कि सामाजिक विभाजन का आधार कार्य संबंधी कौशल एवं क्षमता थी।

खान-पान

सिंधु घाटी के निवासी शाकाहारी एवं मांसाहारी दोनों प्रकार के भोज्य पदार्थ ग्रहण करते थे ।गेहूं एवं दाल उनके मुख्य भोजन थे उत्खनन में अनेक ऐसी मुद्राएं मिली हैं जिन पर मछली पकड़ने शिकार करने तथा बलि देने के चित्र अंकित हैं तथा जो उनके मांसाहारी होने के संकेत हैं

सिंधु वासियों को कुछ फलों का भी ज्ञान था इन फलों में नारियल, तरबूज ,खजूर नींबू प्रमुख रूप से उल्लेखनीय है सात सब्जियों का प्रयोग करने संबंधी प्राण प्रणाम भी मिले हैं सिंधु निवासी दूध दही एवं मिष्ठान का भी प्रयोग करते थे खुदाई में मिठाई एवं रोटी बनाने के सांचे भी मिले हैं ।

वस्त्र विन्यास

सिंधु घाटी की सभ्यता में स्त्री और पुरुषों में के पहनावे में कोई विशेष अंतर नहीं था दोनों के वस्त्र निवास में दो कपड़ों का उपयोग होता था पुरुष लोग धोती पहनते थे और कंधे पर साल अथवा साल डालते थे स्त्रियां भी धोती घाघरा पहनती थी तथा सिर पर एक विशेष प्रकार का वस्त्र पहनती थी जो सिर के पीछे की तरफ पंख की तरह उठा रहता था उत्खनन में प्राप्त तकली ,बटन आदि से प्रतीत होता है कि सिंधु सभ्यता के निवासी सूती ऊनी वस्त्र बनाना जानते थे और सिले हुए कपड़ों का प्रयोग करते थे ।

आभूषण

खुदाई में लगभग सभी स्थलों से आभूषणों के पूरे और टूटे हुए हिस्से प्राप्त हुए हैं इससे ज्ञात होता है कि सिंधु सभ्यता के लोगों को आभूषण का बहुत शौक था तथा आभूषण निर्माण की कला का परिचय प्राप्त होता है सेंधव समाज के सभी वर्गों की स्त्री- पुरुष आभूषण पहनते थे अंगूठी ,हार , नथुनी,आभूषण थे

संपन्न वर्ग के लोग मूल्यवान पत्थर सोना, गोमेद, पन्ना, हीरा, लाल मुर्गा, आदि से निर्मित आभूषणों को धारण करते थे सामान्य वर्ग के लोग मिट्टी हड्डी एवं पत्थर से निर्मित आभूषण पहनते थे मोहनजोदड़ो से मार्शल महोदय को काफी बड़े आकार का हार प्राप्त हुआ है मनोरंजन के साधन – सिंधु सभ्यता के लोग मनोरंजन के लिए नृत्य और संगीत में अधिक रूचि लेते थे पैसे का खेल उन्हें अत्यधिक प्रिय था शिकार खेलना जुआ पशु पक्षियों की लड़ाई आदि मनोरंजन के अन्य प्रमुख साधन थे खुदाई में पत्थर मिट्टी हाथी दांत तथा तांबे से निर्मित बच्चों के अनेक प्रकार के खिलौने भी प्राप्त हुए हैं शतरंज चौपड़ तथा मछली पकड़ना भी मनोरंजन के प्रमुख साधन थे।

सिंगार

सेंधव समाज के लोगों को सिंगार का बहुत शौक था पुरुष दाढ़ी मूछ रखते थे तथा स्त्रियां बाल संवारती थी इसकी पुष्टि उत्खनन में प्राप्त सामग्री से होती है लोग प्रशासन प्रेमी थे हड़प्पा की खुदाई में एक बोतल मिली है जिसमें संभवत काजल है इसलिए इस प्रकार मोहनजोदड़ो से सिंगारदान, लिपिस्टिक, कांसे के अंडाकार हाथी दांत की कंघियां आदि सामग्री प्राप्त हुई है

जिनसे इनकी सभ्यता का प्रमाण मिलता है स्त्रियों में सुव्यवस्थित केश विन्यास का प्रचलन था यह बालों को विभिन्न तरीकों से संवारती थी वह प्रायः लंबे बाल रखती थी यह श्रेय के बीच से मार्ग निकालती थी खुदाई में कुछ घोंघे भी मिले हैं जिनमें संभवत: प्रशासन सामग्री रखी जाती थी ऐसा प्रतीत होता है कि मोहनजोदड़ो की स्त्रियां सिंगार कला में वर्तमान स्त्रियों से कम ना थी।

स्त्रियों की दशा –

सिंधु सभ्यता में स्त्रियों का सम्मान होता था एवं परिवार में उन्हें महत्वपूर्ण स्थान मिलता था स्त्रियां पुरुषों के साथ विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक कृत्यों से में भाग लेती थी सिंधु सभ्यता में परिवार मातृसत्तात्मक होता था खुदाई में प्राप्त मानव आकृतियों के चित्रों में अधिकांश स्त्रियों के चित्र हैं स्त्रियों का मुख्य कार्य संतान का लालन पालन एवं गृह कार्य को संपन्न करना था संभवत उस समय पर्दा प्रथा का प्रचलन नहीं था ।

अस्त्र शस्त्

प्राप्त अवशेषों का अध्ययन करने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि यहां के लोगों को लोहे का ज्ञान नहीं था यह लोग शांत प्रिय जीवन व्यतीत करते थे संभवत हड्डी ,तीर कमान आदि हथियार बनाते थे किंतु इनका प्रयोग योद्धा संघर्ष आदि में नहीं वरन शिकार के लिए किया जाता था ।

मृतक संस्कार- सिंधु सभ्यता के लोगों में मृतक संस्कार की तीन विधियां प्रचलित थी।

  1. मृतक को भूमि में दफना दिया जाता था।
  2. मृतक के शरीर को जंगल में खुला छोड़ दिया जाता था
  3. मृतक को जलाकर उसकी हड्डी एवं भस्म को एक घड़े में बंद करके भूमि में गाड़ दिया जाता था।

सिंधु सभ्यता मृत्यु के पश्चात जीवन में विश्वास करते थे इसलिए वह मृतक के साथ दैनिक आवश्यकता की सामग्री भी रख देते थे।

सिन्धु सभ्यता का आर्थिक जीवन

  • कृषि
  • पशुपालन
  • शिल्प एवं उद्योग धंधे
  • व्यापार

सिंधु सभ्यता के निवासियों का आर्थिक आधार भी सुदृढ़ था नगरीकरण सिंधु सभ्यता की एक प्रमुख विशेषता थी कृषि पालन उद्योग धंधे वाणिज्य व्यापार एवं शिल्प इस सभ्यता के लोगों के आर्थिक जीवन के मुख्य आधार थे।

कृषि:-सिंधु सभ्यता के अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर आधारित थी। सिन्धु एवं उसकी सहायक नदियों द्वारा चलाई गई पूर्वक मिट्टी कृषि कार्य के लिए अत्यंत उपयोगी होती थी सिन्धुवासी कृषि संबंधी कार्यों के लिए पत्थर एवं कांस्य के बने उपकरणों का प्रयोग करते थे। वर्षा एवं नदियों का जल सिंचाई के काम आता था सिंधु निवासियों की प्रमुख फसलें गेहूं तथा जौं थी इनके अतिरिक्त चावल, राई ,मटर ,तेल ,सरसों ज्वार बाजरा आदि उगाया जाता था सिंधु वासी साग सब्जी भी उग आते थे तथा इन्हें फलों का भी ज्ञान था।

पशुपालन:-सिंधु सभ्यता के आर्थिक जीवन का दूसरा प्रमुख आधार पशुपालन था खुदाई में प्राप्त मोहरों तथा खिलौनों से स्पष्ट होता है कि गाय, भैंस ,बकरी, सूअर ,गधे कुत्ते ,बिल्ली, हाथी ऊंट आदि उस काल के प्रमुख पालतू जानवर थे ।सिंधु सभ्यता के लोग ऊंट और घोड़े का प्रयोग कम ही करते थे कृषि एवं गृह कार्य में पशुओं का उपयोग किया जाता था।

वस्त्र व्यवसाय:-सिंधु सभ्यता के निवासी सूती रेशमी वस्त्रों का प्रयोग करते थे कपास से सूत कातकर सूती वस्त्र बनाए जाते थे वस्त्रों को अनेक आकर्षक रंगों से रंगा जाता था एवं उन पर कढाई भी की जाती थी ऐसे भी प्रमाण मिले हैं कि सिंधु वासी वस्तुओं का निर्यात भी करते थे।

शिल्प एवं उद्योग धंधे:-सिंधु निवासी विभिन्न शिल्प कला एवं उद्योगों की निपुणता एवं ज्ञान रखते थे इनका औद्योगिक जीवन उन्नत था सिंधु सभ्यता में सूत कातना, सूती वस्त्रों की बुनाई ,आभूषण निर्माण, लुहारी का कार्य आदि व्यवसाय अत्यंत उन्नत अवस्था में थे।

लोथल नामक स्थल से प्राप्त मुद्राको पर सूती वस्त्रों की छाप अंकित है इसी प्रकार मोहनजोदड़ो से लाल कपड़े के अवशेष रजत पात्र में पाये गये है ऐसा प्रतीत होता है कि मिट्टी, धातु, पत्थर एवं हाथी दांत से विविध प्रकार की वस्तुएं निर्मित करने में सैन्धव शिल्पी विशेष रूप से दक्ष थे।

व्यापार:-सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था में व्यापार एवं वाणिज्य भी पर्याप्त विकसित अवस्था में था सिंधु सभ्यता की अत्यंत महत्वपूर्ण विशेषता थी कि यह एक उन्नत नागरिक सभ्यता थी इसी कारण यहां व्यापार एवं वाणिज्य की विशेष प्रगति हुई सिंधु सभ्यता के प्रमुख स्थलों से ऐसे साक्ष्य प्राप्त हुए हैं

जिनसे प्रमाणित होता है कि इनके विदेशों से भी व्यापारिक संबंध थे कीमती पत्थरों के मन के हाथी दांत से निर्मित वस्तुएं पश्चिमी एशिया में निर्यात की जाती थी सिंधु निवासी अफगानिस्तान से टीन तथा शीशा एवं फारस की खाड़ी से लाल रंग आयात करते थे।

सेंधव सभ्यता में आंतरिक व्यापार समृद्ध था आंतरिक एवं विदेशी व्यापार के लिए मस्तूलदार नावों का प्रयोग होता था लोथल उस समय का एक प्रसिद्ध बंदरगाह था

व्यापारिक क्रियाकलापों में बांट माप का विशेष महत्व था बांट बनाने के लिए भूरे रंग के चार्ट पत्थर एवं सेलखड़ी का प्रयोग किया जाता था खुदाई में कांसे की एक क्षण भी पाई गई है।

जिस पर निश्चित दूरी के चिन्ह भी बनाए गए हैं विद्वानों का मत है कि एक बाट एवं क्षण उस समय नाप तोल के साधन रहे होंगे।

धार्मिक जीवन

सिंधु सभ्यता के धर्म के विषय में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता है क्योंकि इतिहास कार्य एवं पुरातत्ववेदत्ता अभी तक सिंधु लिपि को पढ़ने इसमें सफल नहीं हो पाए हैं इस प्रकार सेंधव धर्म के विषय में निश्चित एवं प्रमाणिक साक्ष्यों का पूर्ण अभाव है पुरातात्विक उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर विभिन्न विद्वानों ने केवल अनुमान लगाए हैं विद्वानों के अनुमान के आधार पर सिंधु सभ्यता में मातृ शक्ति की उपासना पशुपति के रूप में देव पूजा , योनि पूजा, लिंग पूजा, वृक्ष- पूजा,पशु- पूजा,जल की पवित्रता, मूर्ति पूजा आदि का प्रचलन था।

  • मातृशक्ति की पूजा
  • पशुपति पूजा
  • पशु पूजा
  • नाग पूजा
  • वृक्ष पूजा

मातृशक्ति की पूजा:-

सेंधव सभ्यता के पुरा स्थलों से प्राप्त मिट्टी की मूर्तियां एवं मोहरों पर अंकित नारियां आकृति मातृ देवी की उपासना के स्पष्ट परिणाम है हड़प्पा से प्राप्त एक मोहर में सिर के बल खड़े एक स्त्री का चित्र अंकित है जिसकी योनि से एक पौधा निकलता दिखाया गया है मोहरों पर अंकित अन्य मूर्तियां भी प्राप्त हुई हैं जिनमें किसी में नारी शिशु को स्तनपान करा रही है किसी में नारी के गर्व से बृक्ष निकलता हुआ दिखाया गया है संभवत यह सभी मातृ देवी की उपासना के साक्ष्य हैं।

पशुपति पूजा:-

सिंधु सभ्यता में पशुपति की उपासना होती है पशु पति नामक देवता का अंकन हमें सिंधु कालीन पुरावशेषों में देखने को मिलता है प्रसिद्ध पूरा विद मैक महोदय को मोहनजोदड़ो से एक मोहर प्राप्त हुई है जिसमें सीगंवाले त्रिमुखी पुरुष को एक सिंहासन पर योग मुद्रा में बैठे हुए हिरण अंकित हैं जिनमें एक खंडित अवस्था में है जान मार्शल महोदय ने इसे ऐतिहासिक काल के शिव का प्राक प्रारंभिक रूप कहा है।

लिंग एवं योनि पूजा- खुदाई में चमकीले पत्थरों पर निर्मित कतिपय ऐसे चिन्ह प्राप्त हुए हैं जिनकी पुष्टि लिंग एवं योनि के रूप में की गई है कतिपय विद्वानों का अनुमान है कि सेंधव निवासी प्रकृति प्रजनन शक्ति के प्रतीक के रूप में लिंग और योनि की उपासना किया करते थे

पशु पूजा:-

सिंधु सभ्यता की अनेक पूरा स्थलों से प्राप्त मोहरों ताम्रपत्र आदि पर बैल भैंसा हाथी गैंडा बाघ हिरण आदि के चित्र अंकित हैं मार्शल कहते हैं कि कुछ पशुओं जैसे बैल भैंसा बाद आज की पूजा सख्त के प्रतीक के रूप में भी की जाती रही होगी।

नाग पूजा:-

उपलब्ध पुरातात्विक साक्ष्यों से प्रमाणित होता है कि सिंधु सभ्यता के धार्मिक जीवन में नाग पूजा का भी प्रचलन था मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मुद्रा पर एक देवता के दोनों तरफ एक- एक नाग अंकित हैं लोथल से प्राप्त चित्रों पर भी सर्प के चित्र बने हुए हैं अंत यह कहा जाता जा सकता है कि सिंधु कालीन लोग नाग- पूजा भी करते थे।

वृक्ष पूजा:-

सिंधु सभ्यता के स्थलों से उत्खनन में प्राप्त मोहरों एवं मृदभांड आदि पर पीपल पेड़ खजूर एवं नीम आदि वृक्षों के चित्र अंकित पाए गए हैं कतिपय ऐसे भी साक्ष्य उपलब्ध हुए हैं जिनमें बृक्ष के पास उपासक बैठा हुआ दिखाया गया है। यह साक्ष्यो से प्रमाणित होता है कि सिंधु सभ्यता के लोग वृक्षों को पवित्र मानकर उनकी उपासना करते थे

अन्य प्रथाएं-

खुदाई के परिणाम स्वरुप कतिपय अन्य साक्ष्य भी प्राप्त हुए हैं जिनसे अनुमान लगाया गया है कि सिंध निवासी जल को पवित्र मानते थे वह सूर्य की उपासना करते थे तथा आदमी को भी देवता के रूप में स्वीकार कर उपासना करते थे-(सिंधु घाटी सभ्यता)

सेंधव कला

सिंधु सभ्यता के स्थलों की खुदाई में बहुसंख्यक मूर्तियां बर्तन खिलौने आभूषण आदि प्राप्त हुए हैं इससे सिंधु कालीन विभिन्न कलाओं की जानकारी होती है प्राप्त पूरा पैसों को देखने से पता चलता है कि सिंधु कलाओं का कौशल अद्वितीय था

भवन निर्माण कला

भवनों को देखकर निष्कर्ष निकलता है कि सिंधु सभ्यता के वास्तुकार दक्ष थे हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो नामक नगरों का वास्तु विन्यास उच्च कोटि का था उनके द्वारा निर्मित विभिन्न भवन उनके भवन निर्माण किस शैली उनके इस क्षेत्र में कौशल का बोध कराते हैं

मूर्ति कला- सिंधु सभ्यता के लोग मूर्ति निर्माण कला में भी कुशल थे उनके द्वारा निर्मित मिट्टी पाषाण काशी एवं ताम्र आदि अनेक मूर्तियां खुदाई में प्राप्त हुई हैं इन मूर्तियों में की पत्तियां मूर्ति विशेष उल्लेखनीय है यह सेल खंडी की बनाई हुई 19 सेंटीमीटर लंबी पुरुष की मूर्ति है जो तिब्बिया अलंकरण से युक्त चादर ओढ़े हुए हैं इसी प्रकार मोहनजोदड़ो से एक नर्तकी की कहां से मूर्ति मिली है मिट्टी की भी आकर्षक मूर्तियां उत्खनन के दौरान प्राप्त हुई है मिट्टी की इन मूर्तियों पर विविध रंगों की पॉलिश की गई है

मोहर निर्माण कला- उत्खनन से सिंधु सभ्यता से संबंधित लगभग 5000 मोहरे प्राप्त हुई है यह मोह अरे लाख पत्थर तथा चमड़े पर बनी हुई हैं बहुत सी मोहरों परसाना हाथी बारहसिंघा आदि पशुओं के चित्र बने हैं

चित्रकला- सिंधु सभ्यता में बर्तन आदि पर जो सुंदर चित्रकारी प्राप्त हुई है उससे स्पष्ट है कि सेंधव चित्रकार चित्र निर्माण कला में भी दक्ष एवं सिद्धहस्त थे चित्रों में रंगों का प्रयोग किया जाता था दैनिक उपयोग की वस्तुओं जैसे वस्तु बर्तन आदि पर चित्रकारी करने में नागरिकों की विशेष अभिरुचि थी

मुद्रा निर्माण कला- सिंधु घाटी से प्राप्त मुद्राएं मुद्रा निर्माण कला के समुचित होने का स्पष्ट प्रमाण देती है इस कला की मुद्राओं पर किसी ना किसी उपज की आकृति अंकित है जैसे हाथी बेल गैंडा आदि

संगीत एवं नृत्य कला- खुदाई में प्राप्त विभिन्न मुद्राओं पर संगीत के बाद यंत्र बने हुए हैं जैसे ढोल सिटी बांसुरी विमला तथा नर्तकी की कहां से प्रतिमाह दिए आकृतियां एवं चिन्ह इनकी संगीत एवं नृत्य कला में रोज को प्रदर्शित करती है

लेखन कला- सेंधव नागरिकों को लेखन कला का ज्ञान था उत्खनन में सिंधु लिपि के लगभग 400 चिन्ह प्राप्त हुए हैं उनकी लिपि सामान्यता बाएं से दाएं और है लेखक प्रणाली में प्रयुक्त चिन्ह अक्षर सोचा क्यों चित्रात्मक दोनों प्रकार के हैं सुख सुरकोटदा और बनावली नामक स्थान स्थलों से कतिपय बर्तनों के टुकड़ों पर हड़प्पा लिपि अंकित मिली है

किंतु शायद वो लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है और विद्वानों के लिए चुनौती बनी हुई है।

हंटर महोदय का विचार है “सिंधु लिपि चित्र प्रभाव प्रधान है और इसमें लगभग 400 वर्ण है इस लिपि में कहीं पर वर्णों का प्रयोग हुआ है और कहीं पर संख्या संकेत आत्मक चित्रों का यह लिपि दाएं से बाएं लिखी गई है

हडप्पा सभ्यता के राजनीतिक जीवन

सिंधु लिपि को पढ़ने में अक्षम रहने के कारण इस काल के राजनीतिक जीवन का निर्धारण अत्यंत दुष्कर्म एवं कठिन कार्य है उत्खनन में प्राप्त विभिन्न भाग्य आवेशों के आधार पर ही सिंधु सभ्यता की राजनीतिक स्थिति और प्रशासन का अनुमान किया जा सकता है सिंधु कालीन राजनीतिक जीवन के संबंध में विभिन्न विद्वानों द्वारा निम्नलिखित विचार व्यक्त किए गए हैं।

प्रसिद्ध विद्वान मैंके का मानना है कि “मोहनजोदड़ो में एक प्रतिनिधि सांसद प्रशासन का कार्य चलता था”

हंटर महोदय के अनुसार “मोहनजोदड़ो में लोक लोकतंत्रात्मक शासन व्यवस्था थी तथा जनप्रतिनिधियों द्वारा शासकीय कार्य संपादित किए जाते थे”

हीलर का कहना है कि “मोहनजोदड़ो की शासन व्यवस्था पुरोहितों और धर्मगुरुओं के हाथों में केंद्रित थी प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि सेंधव निवासियों का जीवन राजनीतिक दृष्टि से सुख और शांति पूर्ण था नागरिकों को सार्वजनिक रूप से अधिकाधिक सुख सुविधाएं प्रदान की गई थी।

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